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कुल्टी में बदले सियासी समीकरण, अख्तर हुसैन ने टीएमसी को समर्थन दिया सार्वजनिक रूप से

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आसनसोल :  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कुल्टी क्षेत्र में रविवार को राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। लंबे समय से अलग रुख अपनाए हुए पूर्व बागी नेता अख्तर हुसैन ने तृणमूल कांग्रेस के मंच पर पहुंचकर पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में खुलकर अपील की, जिससे स्थानीय राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।

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बराकर बस स्टैंड के समीप आयोजित एक चुनावी सभा में यह घटनाक्रम सामने आया। कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार Abhijit Ghatak और पार्टी की सांसद Sayani Ghosh सहित कई स्थानीय नेता एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में समर्थकों की मौजूदगी के बीच अख्तर हुसैन ने मंच साझा किया और पार्टी के पक्ष में मतदान करने की अपील की।

ज्ञात हो कि अख्तर हुसैन इससे पहले तृणमूल कांग्रेस से असंतुष्ट होकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने के संकेत दे चुके थे। ऐसे में उनका अचानक रुख बदलना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी चर्चा का विषय बन गया है। माना जा रहा है कि उनके इस निर्णय से कुल्टी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी समीकरण पर सीधा असर पड़ सकता है।

सभा को संबोधित करते हुए अभिजीत घटक ने क्षेत्र के समग्र विकास का रोडमैप प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करना उनकी प्राथमिकता होगी। इसके साथ ही उन्होंने एक आधुनिक इनडोर स्टेडियम, सांस्कृतिक सभागार और नए अग्निशमन केंद्र की स्थापना का भी आश्वासन दिया। उन्होंने मतदाताओं से विकास के मुद्दे पर समर्थन देने की अपील की।

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वहीं, सायनी घोष ने अपने संबोधन में केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए राज्य में चल रही विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जनता के हित में कार्य कर रही है और इन प्रयासों को और मजबूती देने के लिए जनसमर्थन जरूरी है।

रैली के दौरान कार्यकर्ताओं में उत्साह देखने को मिला और पूरे क्षेत्र में इस राजनीतिक घटनाक्रम की चर्चा तेज हो गई। स्थानीय स्तर पर इसे चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अख्तर हुसैन का समर्थन तृणमूल कांग्रेस को अतिरिक्त बढ़त दिला सकता है, वहीं विपक्षी दलों के लिए यह चुनौती भी बन सकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मतदाता इस नए समीकरण को किस तरह स्वीकार करते हैं और चुनाव परिणामों पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है।

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