कोलकाता/आसनसोल : पश्चिम बंगाल के औद्योगिक क्षेत्र में सक्रिय अवैध कोयला खनन और रंगदारी वसूली के बड़े नेटवर्क पर रविवार को प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी कार्रवाई और तेज कर दी। केंद्रीय जांच एजेंसी Enforcement Directorate (ईडी) ने कोलकाता स्थित विशेष पीएमएलए न्यायालय में पांच आरोपियों के खिलाफ अभियोजन शिकायत दायर कर मामले को नई दिशा दे दी है।

इस चार्जशीट में मुख्य रूप से चिन्मय मंडल और किरण खान को आरोपी बनाया गया है, जिन्हें एजेंसी ने इसी वर्ष फरवरी में धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी के अनुसार, यह पूरा मामला एक संगठित गिरोह से जुड़ा है, जो दुर्गापुर-आसनसोल और आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध गतिविधियों को अंजाम दे रहा था।
ईडी की जांच में सामने आया है कि यह सिंडिकेट केवल अवैध कोयला खनन तक सीमित नहीं था, बल्कि झारखंड से पश्चिम बंगाल में कोयले की अवैध आपूर्ति और फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से उसकी बिक्री का भी संगठित नेटवर्क चला रहा था। इसके साथ ही यह गिरोह वैध कारोबारियों से जबरन वसूली कर रहा था, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘गुंडा टैक्स’ या ‘रंगदारी’ के नाम से जाना जाता है।
एजेंसी के अनुसार, यह अवैध वसूली प्रति टन 275 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक की जाती थी, जो कोयले के वास्तविक मूल्य का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा होती थी। इस कारण कई वैध डिलीवरी ऑर्डर धारकों और परिवहनकर्ताओं को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। जांच में यह भी पाया गया कि इस वसूली को छिपाने के लिए इसे लिफ्टिंग चार्ज, हैंडलिंग शुल्क या दान के रूप में दर्शाया जाता था।

ईडी का दावा है कि पिछले पांच वर्षों में इस गिरोह ने रंगदारी के जरिए 650 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई की है। इस अवैध गतिविधि का सीधा असर Eastern Coalfields Limited (ईसीएल) पर पड़ा, जिसे बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा। आवंटित कोयले का एक बड़ा हिस्सा उठाया ही नहीं जा सका, जिससे उत्पादन और वितरण दोनों प्रभावित हुए।
जांच के दौरान एजेंसी ने नवंबर 2025 और फरवरी 2026 में विभिन्न स्थानों पर छापेमारी कर 17.57 करोड़ रुपये की नकदी, बैंक खातों में जमा रकम और अन्य कीमती संपत्तियां जब्त की हैं। इसके अलावा, भारी मात्रा में कोयला और कोक का स्टॉक भी बरामद किया गया है, जो अवैध कारोबार की पुष्टि करता है।
ईडी की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपियों ने अपनी काली कमाई को वैध बनाने के लिए कई शेल कंपनियों और फर्जी फर्मों का सहारा लिया। इन कंपनियों के माध्यम से पैसे को घुमाकर वैध दिखाने की कोशिश की जाती थी, जिससे जांच एजेंसियों को गुमराह किया जा सके।
अधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार एक बड़े नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एजेंसी अन्य संदिग्धों और सहयोगियों की पहचान करने में जुटी हुई है। आने वाले दिनों में और भी खुलासे होने की संभावना जताई हत्वपूर्ण होगा कि जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है और इसमें और किन-किन लोगों की संलिप्तता सामने आती है।















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