

बर्धमान : पीएच‑डी प्रवेश हेतु प्रकाशित प्रारम्भिक मेधा‑सूची में शोधार्थियों के नाम, जाति‑श्रेणी व लिंग के साथ ‘धर्म’ कॉलम भी प्रदर्शित होने पर बर्धमान विश्वविद्यालय घोर आलोचना के घेरे में आ गया। प्रायः प्रशासनिक प्रपत्रों में आवेदकों से धर्म‑सूचना ली जाती है, किंतु सार्वजनिक गुणांक‑सूची में उसका प्रकाशन विरल उदाहरण है। सूची जारी होते ही अकादमिक एवं नागरिक वर्ग में तीखी बहस छिड़ गई—क्या उच्च शिक्षा संस्थान को छात्र‑धर्म इस तरह उजागर करना उचित है?

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शंकरकुमार नाथ ने सफ़ाई देते हुए कहा, “आवेदन‑पत्र में ‘रिलिज़न’ की प्रविष्टि सामान्य प्रक्रिया है। वेबसाइट पर अपलोड करते समय तकनीकी चूक से वह कॉलम हटाया नहीं गया। किसी वर्ग को छोटा‑बड़ा दिखाने की मंशा नहीं थी; त्रुटि ज्ञान में आते ही सुधार कर दिया गया।” प्रशासन का दावा है कि यह कार्य ‘डेटा प्रोसेसिंग’ संस्था के मानवीय भ्रम से हुआ।

फिर भी परीक्षा नियंत्रक विभाग के एक अधिकारी ने टिप्पणी की, “जहाँ पूर्व प्रथानुसार सार्वजनिक सूची में धर्म प्रदर्शित नहीं होता, वहाँ आउटसोर्स एजेंसी ने स्वतः शामिल कैसे कर दिया? प्रकल्पित ‘गलती’ के परदे में कोई सुकृत–दुर्घटनावश पक्षपात या चुपचाप पहचान‑राजनीति तो नहीं?”
राज्य में हालिया साम्प्रदायिक तनाव के परिप्रेक्ष्य में यह प्रकरण संवेदनशील मानकर शिक्षा‑जगत में असहजता उत्पन्न हुई है। छात्र संगठनों ने आशंका जताई कि धार्मिक पहचान उजागर करने से शोधार्थियों की गोपनीयता और निष्पक्ष मूल्यांकन पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। सोशल मीडिया पर ‘भेदभावपूर्ण रुझान’ और ‘आंकड़ों की साजिश’ जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

विशेषज्ञों का मत है कि आरक्षण नीतियों के अन्तर्गत सार्वजनिक सूचियों में जाति/वर्ग अंकित हो सकती है, किन्तु धर्म का उल्लेख संवेदनशील निजता से जुड़ा है और भेदभाव निरोधक सिद्धांतों के विपरीत जाता है। पूर्व कुलपति प्रो. अरुण कुमार चक्रवर्ती ने कहा, “विश्वविद्यालयों को तथ्यान्वेषण एवं पारदर्शिता के संतुलन में सावधानी बरतनी चाहिए। तकनीकी ठेका‑कर्मियों पर निर्भरता कम कर प्रशासनिक नियमन सुदृढ़ करना होगा।”
बर्धमान विश्वविद्यालय ने वेबसाइट से संशोधित सूची अपलोड कर दी है; विवादास्पद कॉलम हट गया। कुलपति ने आदेश दिया है कि भविष्य में कोई भी सार्वजनिक दस्तावेज़ अपलोड होने से पूर्व द्वि‑स्तरीय अभिरुचि‑समीक्षा (मैनुअल ऑडिट) होगी। साथ ही संबंधित डेटा‑संसाधक एजेंसी को कारण‑बताओ नोटिस भेजा गया है।

छात्र परिषदों ने इस आश्वासन का स्वागत किया परन्तु माँग रखी कि दोषसिद्ध कर्मियों पर अनुशासनिक कार्रवाई हो तथा नयी एडमिशन नीति में ‘सेंसिटिव फ़ील्ड’ मास्किंग का स्पष्ट प्रावधान जोड़ा जाए। इस घटना ने पुनः रेखांकित किया कि डिजिटलीकृत सूचनाओं के युग में ‘डेटा एथिक्स’ और ‘निजता‑संरक्षण’ विश्वविद्यालय प्रशासन की अनिवार्य ज़िम्मेदारी है।














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