आसनसोल : पश्चिम बंगाल विधानसभा में बुधवार को शिक्षा और भाषाई समन्वय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय चर्चा का केंद्र रहा। पांडवेश्वर के विधायक जितेंद्र तिवारी ने राज्य के हिंदी माध्यम विद्यालयों में बंगला भाषा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की मांग उठाते हुए कहा कि भाषा किसी भी समाज को जोड़ने का माध्यम होती है, इसलिए विद्यार्थियों को राज्य की भाषा और संस्कृति से परिचित कराना समय की आवश्यकता है।
विधानसभा में बजट पर चर्चा के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए विधायक ने कहा कि पश्चिम बंगाल विविध भाषाओं और संस्कृतियों का संगम है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे परिवार निवास करते हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी है और उनके बच्चे हिंदी माध्यम विद्यालयों में अध्ययन करते हैं। ऐसे विद्यार्थियों के लिए बंगला भाषा का ज्ञान न केवल शैक्षणिक दृष्टि से उपयोगी होगा, बल्कि उन्हें राज्य की सांस्कृतिक विरासत, साहित्य और सामाजिक जीवन को समझने में भी सहायता मिलेगी।
उन्होंने कहा कि बीते कुछ वर्षों में भाषा को लेकर विभिन्न प्रकार की बहसें और मतभेद देखने को मिले हैं। ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से भाषाई सौहार्द और सामाजिक एकता को मजबूत किया जाए। उनका मत था कि विद्यार्थियों को एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान मिलने से उनके बौद्धिक विकास के साथ-साथ रोजगार और सामाजिक अवसरों का भी विस्तार होता है।
विधायक ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि हिंदी माध्यम विद्यालयों में बंगला भाषा की पढ़ाई को व्यवस्थित रूप से लागू करने के लिए विशेष योजना तैयार की जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जहां आवश्यकता हो, वहां योग्य बंगला शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए, ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो सके। उनके अनुसार केवल विषय को पाठ्यक्रम में शामिल कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक संसाधन और प्रशिक्षित शिक्षक भी उपलब्ध कराने होंगे।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि बहुभाषी शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न भाषाओं का ज्ञान उन्हें व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है और विभिन्न समुदायों के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने में सहायक होता है। विशेष रूप से उस राज्य की भाषा का ज्ञान, जहां विद्यार्थी रहते हैं, उन्हें स्थानीय प्रशासन, संस्कृति और सामाजिक परिवेश को समझने में मदद करता है।
राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में इस प्रस्ताव को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कई शिक्षाविदों का कहना है कि यदि इस दिशा में ठोस पहल की जाती है तो यह भाषाई समावेशन और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाला कदम साबित हो सकता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श और सभी पक्षों की राय लेने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए।
फिलहाल विधानसभा में उठी इस मांग ने शिक्षा नीति, भाषाई संतुलन और सांस्कृतिक समन्वय को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। अब निगाहें राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के आगामी निर्णयों पर टिकी हैं कि इस प्रस्ताव को किस रूप में आगे बढ़ाया जाता है।

















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