पांडेश्वर में श्रमिक सम्मान दिवस पर प्रशासनिक निषेधाज्ञा से उद्वेलित जनमानस

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पांडेश्वर :  जब सम्पूर्ण विश्व एक मई को श्रमिकों के सम्मान में श्रमिक दिवस को हर्षोल्लास व गरिमा के साथ मना रहा था, उसी समय कोयला उद्योग का प्रमुख केन्द्र पांडेश्वर इस बार अभूतपूर्व खामोशी और अवसाद में डूबा रहा। विगत कई वर्षों से यहां परंपरागत रूप से आयोजित होने वाला श्रमिक दिवस का जनोत्सव इस वर्ष प्रशासनिक अनुमति के अभाव में आयोजित नहीं हो सका, जिससे न केवल श्रमिक वर्ग में तीव्र आक्रोश व्याप्त हो गया, बल्कि समूचे राजनीतिक परिवेश में भी भारी हलचल उत्पन्न हो गई है।

स्थानीय श्रमिक संगठनों ने इस वर्ष भी पूर्ववत जनसभा, सांस्कृतिक आयोजन तथा श्रद्धांजलि सभा की व्यापक तैयारी कर रखी थी, किंतु अंतिम क्षणों में पुलिस प्रशासन ने कार्यक्रम को अनुमति देने से इनकार कर दिया। आयोजकों का स्पष्ट आरोप है कि प्रशासन ने यह निर्णय उच्च राजनीतिक दबाव में लिया, ताकि श्रमिकों की आवाज को व्यवस्थित रूप से दबाया जा सके और उनकी संगठित चेतना को कुंद किया जा सके।

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इस संदर्भ में पांडेश्वर के पूर्व विधायक व भाजपा नेता जितेन्द्र तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा—”यह अत्यंत लज्जाजनक है कि जब वैश्विक पटल पर श्रमिकों को सम्मानित किया जा रहा है, तब पांडेश्वर जैसे खनन क्षेत्र में श्रमिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। यह तृणमूल कांग्रेस की श्रमिक विरोधी मानसिकता और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति उपेक्षात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है।”

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तिवारी ने तृणमूल जिला अध्यक्ष नरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने ही प्रशासनिक तंत्र पर दबाव बनाकर इस आयोजन को रद्द कराया। उनका कहना था—”यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि श्रमिकों की अस्मिता, संघर्ष और चेतना का प्रतीक है। सरकारें आती-जाती हैं, किंतु श्रमिकों की उपेक्षा की परंपरा स्थिर बनी रहती है।”

श्रमिक संगठनों व नागरिक समाज ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार बताया है। सोशल मीडिया पर “#LabourDayBan” हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जिसमें हजारों लोग प्रशासनिक निर्णय की तीव्र आलोचना कर रहे हैं।

IMG 20250311 WA0094इस समग्र प्रकरण पर तृणमूल कांग्रेस की ओर से अब तक कोई औपचारिक वक्तव्य नहीं आया है, किंतु राजनीतिक गलियारों में इस विषय पर उफान थमा नहीं है। पांडेश्वर के मजदूर वर्ग में असंतोष की ज्वाला भड़क चुकी है, जो निकट भविष्य में किसी व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकती है।

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