कोलकाता : सोमवार को पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नामांकन की अंतिम तिथि 16 सितंबर नजदीक आने के बीच कालीघाट तृणमूल ने दोनों सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। प्रत्याशियों के नाम सामने आने के बाद चुनावी मुकाबले की तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हुई है, लेकिन पार्टी के चुनाव चिन्ह और निधि पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद अभी जारी है।
कालीघाट तृणमूल ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान दे को प्रत्याशी बनाया है। पेशे से शिक्षिका संचिता प्रधान दे पंचायत समिति की सदस्य भी रह चुकी हैं और बयाल क्षेत्र की निवासी बताई जाती हैं। पार्टी के इस निर्णय को नंदीग्राम की आगामी राजनीतिक लड़ाई के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वहीं मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर सीट से पूर्व विधायक रबिउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया गया है। चौधरी का क्षेत्रीय राजनीति में पुराना अनुभव है। वर्ष 2013 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता था। 2016 में भी वह रेजिनगर से निर्वाचित हुए। बाद में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और 2021 में तृणमूल के चुनाव चिन्ह पर तीसरी बार विधायक बने।
चुनाव चिन्ह पर बनी असमंजस की स्थिति
प्रत्याशियों की घोषणा के बाद भी तृणमूल के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर है। दोनों गुटों ने तृणमूल के चुनाव चिन्ह और पार्टी निधि पर अपना दावा निर्वाचन आयोग के समक्ष रखा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगामी उपचुनाव में घासफूल का चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलता है।
शनिवार को निर्वाचन आयोग ने दोनों पक्षों के पांच-पांच प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग बैठक की थी। इसके बाद आयोग ने दोनों गुटों को अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए पत्र भेजा। दस्तावेज जमा करने की अंतिम तिथि 16 सितंबर निर्धारित की गई है। आवश्यकता पड़ने पर 17 सितंबर को दोनों पक्षों की दोबारा सुनवाई भी हो सकती है।
कालीघाट गुट को उम्मीद है कि ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल का चुनाव चिन्ह उसके पास रहेगा। सांसद कल्याण बनर्जी भी कह चुके हैं कि उनके प्रत्याशी घासफूल के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि अंतिम निर्णय निर्वाचन आयोग को करना है।
अस्थायी चुनाव चिन्ह की भी संभावना
उपचुनाव की समयसीमा बेहद कम होने के कारण यदि आयोग तत्काल किसी एक गुट के पक्ष में निर्णय नहीं लेता है, तो अस्थायी व्यवस्था की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा। ऐसी स्थिति में घासफूल चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से रोककर दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए जा सकते हैं।
इस निर्णय का सीधा प्रभाव दोनों विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है। इसलिए प्रत्याशियों की घोषणा के बाद राजनीतिक दलों के साथ-साथ मतदाताओं की निगाहें भी निर्वाचन आयोग के निर्णय पर टिकी हैं।
नंदीग्राम में फिर प्रतिष्ठा की लड़ाई
नंदीग्राम में उपचुनाव की पृष्ठभूमि भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था तथा दोनों स्थानों पर जीत दर्ज की थी। बाद में नंदीग्राम सीट छोड़ने के कारण यहां उपचुनाव की स्थिति बनी।
दूसरी ओर रेजिनगर सीट भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। आम जनता विकास पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने 2026 में नौदा और रेजिनगर दोनों सीटों से चुनाव जीतने के बाद रेजिनगर सीट छोड़ दी थी। अब यहां उनके पुत्र गोलाम नबी आजाद चुनाव मैदान में हैं।
कांग्रेस और वाममोर्चा भी मैदान में
रेजिनगर में कांग्रेस ने मोहम्मद अब्दुल्लाही काफ़ी और वाममोर्चा ने सैयद असद अली को प्रत्याशी बनाया है। नंदीग्राम में कांग्रेस की ओर से मिलन प्रधान तथा माकपा की ओर से शांति गिरी चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने दोनों सीटों पर अभी अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है।
16 सितंबर को नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी प्रचार और तेज होने की संभावना है। 6 अक्टूबर को मतदान तथा 9 अक्टूबर को मतगणना के बाद दोनों सीटों के परिणाम सामने आएंगे। फिलहाल प्रत्याशियों से अधिक चर्चा तृणमूल के घासफूल चुनाव चिन्ह को लेकर है। निर्वाचन आयोग का आगामी निर्णय ही तय करेगा कि उपचुनाव में दोनों गुट किस पहचान के साथ जनता के बीच जाएंगे।

















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