
जामुड़िया : राज्य में उद्योग को बढ़ावा देने की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिशों को एक बार फिर गहरा झटका लगा है। सुबह आसनसोल-दुर्गापुर विकास प्राधिकरण (एडीडीए) द्वारा जामुड़िया क्षेत्र में लीज पर दी गई जमीन से अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए की गई कार्रवाई विवादों में घिर गई। जहां एक ओर प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र में पार्किंग स्थल निर्माण की दिशा में काम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीणों ने इसे गरीबों के विस्थापन की साजिश बताते हुए तीखा विरोध जताया।
एडीडीए के टाउन प्लानर अर्पण चटर्जी के नेतृत्व में जब अधिकारी बुलडोजर लेकर उक्त भूमि पर पहुंचे, तो उन्हें स्थानीय ग्रामीणों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके, पुलिस की मदद से निर्माण को ढहा दिया गया। चटर्जी ने कहा कि दो बार नोटिस जारी करने के बावजूद अतिक्रमण नहीं हटाया गया था, इसलिए प्रशासन को यह कदम उठाना पड़ा।

एडीडीए का पक्ष: विकास के लिए ज़रूरी है भूमि खाली कराना
टाउन प्लानर अर्पण चटर्जी ने स्पष्ट किया कि यह जमीन मान स्टील एंड पावर को लीज पर पार्किंग निर्माण के लिए दी गई है। 1.041 एकड़ की यह जमीन पूरी तरह एडीडीए की है और इसके बदले कंपनी ने तय शुल्क भी जमा कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग के विकास में किसी प्रकार की बाधा को राज्य सरकार गंभीरता से ले रही है और कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की जाएगी।
स्थानीय तृणमूल नेता किशोर घोष ने उठाए सवाल
तृणमूल कांग्रेस से जुड़े स्थानीय नेता किशोर घोष ने इस कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि पार्टी में गुटबाजी के कारण एक पक्ष विशेष द्वारा यह सब कराया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मान स्टील पार्किंग के नाम पर सैकड़ों परिवारों को उजाड़ने का प्रयास कर रही है, जिसका वे हर स्तर पर विरोध करेंगे। घोष ने सिंघारण नदी के अतिक्रमण और जल संसाधनों के दोहन का भी मुद्दा उठाया।

ग्रामवासियों की नाराजगी: हम विस्थापन नहीं सहेंगे
स्थानीय निवासी उत्तम घोष ने आरोप लगाया कि पुलिस और एडीडीए की मदद से मान स्टील गरीबों की कृषि योग्य भूमि पर कब्जा कर रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस निष्पक्ष होकर काम नहीं कर रही और राजनीतिक दबाव में कार्य कर रही है। उनका कहना था कि तालाबों की भराई और हरित क्षेत्रों पर निर्माण से पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है।
मान स्टील का दावा: सभी दस्तावेज वैध, कार्य कानूनी
मान स्टील एंड पावर के सहायक महाप्रबंधक आशुतोष चौधरी ने बताया कि कंपनी ने जेएल संख्या 38, आरएस प्लॉट संख्या 25 (पी) व 32 (पी) की भूमि के लिए 22 लाख 12 हजार रुपये का भुगतान कर 36 महीने के लिए वैध लीज प्रमाणपत्र प्राप्त किया है। उन्होंने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि कंपनी विकास के हर कार्य को सरकारी अनुमति के साथ ही कर रही है।

विवाद का असर राज्य सरकार की छवि पर
यह पूरा मामला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा हाल ही में आयोजित बिजनेस समिट में दिए गए उस बयान के ठीक उलट दिखाई देता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उद्योग के खिलाफ कोई भी कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस घटना से यह स्पष्ट हो रहा है कि राज्य में अभी भी औद्योगिक विकास जमीन पर उतरने से पहले ही स्थानीय विरोध और प्रशासनिक चुनौतियों में उलझा हुआ है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन, उद्योग और स्थानीय ग्रामीणों के बीच इस टकराव का समाधान किस तरह से निकलता है और राज्य सरकार इस दिशा में किस तरह का संतुलन साधती है।














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