रानीगंज : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मंगलवार को रानीगंज क्षेत्र में सियासी हलचल उस समय और तेज हो गई, जब भाजपा और माकपा से जुड़े 300 से अधिक कार्यकर्ताओं व समर्थकों ने दल बदलकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। इस सामूहिक शामिलीकरण को तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है, वहीं विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक दबाव और प्रलोभन का परिणाम करार दिया है।

यह घटनाक्रम रानीगंज विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सामने आया, जहां तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार कालो बरन मंडल ने नए शामिल हुए समर्थकों का स्वागत किया। उन्होंने सभी को पार्टी का झंडा सौंपते हुए संगठन को और मजबूत करने का आह्वान किया। इस अवसर पर तृणमूल युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष पार्थ देवासी, बापी चक्रवर्ती सहित कई स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कालो बरन मंडल ने कहा कि रानीगंज की जनता ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका भरोसा विकास और जनकल्याण की राजनीति पर है। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में किए गए कार्यों से प्रभावित होकर लोग तृणमूल कांग्रेस से जुड़ रहे हैं। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा और माकपा के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस योजना या दृष्टिकोण नहीं है, यही कारण है कि उनके कार्यकर्ता लगातार पार्टी छोड़ रहे हैं।
दूसरी ओर, भाजपा ने इस दलबदल को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा रानीगंज शहर मंडल के नेता शमशेर सिंह ने कहा कि कुछ लोगों के पार्टी छोड़ने से संगठन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस बार-बार अपने ही लोगों को शामिल कर संख्या बढ़ाने का दिखावा करती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि तृणमूल दबाव और लालच देकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है, लेकिन इससे चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं होंगे।

माकपा की ओर से भी इस घटनाक्रम को लेकर नाराजगी जताई गई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इस प्रकार के दलबदल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं और चुनावी माहौल को प्रभावित करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के सामूहिक दलबदल चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां मुकाबला कड़ा है। रानीगंज विधानसभा क्षेत्र में भी अब चुनावी प्रतिस्पर्धा और दिलचस्प हो गई है। एक ओर तृणमूल कांग्रेस इसे अपनी बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण बता रही है, वहीं भाजपा और माकपा इसे रणनीतिक दबाव और सत्ता के प्रभाव का परिणाम मान रहे हैं।
फिलहाल, इस घटनाक्रम के बाद रानीगंज का चुनावी माहौल और गर्म हो गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस दलबदल का वास्तविक असर मतदाताओं के रुझान और चुनाव परिणामों पर कितना पड़ता है।















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