
अंडाल : पश्चिम बंगाल के अंडाल क्षेत्र में एक बारह वर्षीय बालक ने पूरे गाँव में चर्चा का विषय बना दिया है। अपने नन्हे हाथों से सृजित देवी दुर्गा की प्रतिमा, स्वनिर्मित मंडप और समर्पित पूजा-अर्चना की अद्भुत परंपरा ने सौरीश बनर्जी को लोक-आकर्षण का केंद्र बना दिया है। इस बालक ने न केवल मूर्ति निर्माण किया, बल्कि स्वयं ही पुरोहित बनकर मंत्रोच्चारण करते हुए देवि दुर्गा की उपासना भी कर रहा है। इस अद्वितीय संकल्प और श्रद्धा से युक्त पूजा को देखकर पूरा गाँव स्तब्ध है और भक्ति-भाव से ओतप्रोत भी।

उखरा ग्राम के मुखर्जी पाड़ा स्थित सौरीश का यह पूजा आयोजन किसी विशिष्ट घटना से कम नहीं है। स्थानीय लोग बालक सौरीश की अद्वितीय प्रतिभा और उसकी निष्ठा को नमन करने हेतु बड़ी संख्या में एकत्रित हो रहे हैं। सौरीश के पिता, रंजन बनर्जी, जो ईसीएल के कर्मी हैं, तथा उसकी माता, शुक्ला बनर्जी, ने बताया कि बालक में यह कला अत्यंत बाल्यावस्था से ही थी। अपनी इसी प्रवीणता के कारण सौरीश ने पिछले पाँच वर्षों से देवी की प्रतिमा अपने हाथों से निर्मित करते हुए काली और दुर्गा की पूजा की शुरुआत की थी।
इस वर्ष सौरीश ने एक फुट ऊँची कागज की सपरिवार देवी दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण किया और घर की छत पर कपड़ों और प्लाईवुड से मंडप सजा कर षष्ठी के दिन विधिवत पूजा का शुभारंभ किया। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत था—बारह वर्ष का यह बालक अत्यंत मनोयोग से मंत्रोच्चारण करते हुए शास्त्रसम्मत विधि से पूजा-अर्चना कर रहा था। उसकी भक्ति और संकल्प की शक्ति को देखकर गाँववासी भी चकित और प्रेरित हैं।
सौरीश ने बताया कि मूर्ति निर्माण की कला उसे अपनी दिवंगत दादी से मिली, जो उसे माटी उपलब्ध कराती थीं, जिससे वह देवी काली और दुर्गा की मूर्तियाँ बनाता था। दादी के स्वर्गवास के पश्चात, इस बार उसने कागज से प्रतिमा निर्माण कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। सौरीश का सपना है कि वह भविष्य में एक चिकित्सक बने, किंतु पूजा-पाठ की यह परंपरा वह अनवरत जारी रखना चाहता है।


सौरीश के चाचा चंदन बनर्जी, सेवानिवृत्त ईसीएल कर्मी, और चाची सुजाता बनर्जी, सौरीश की पूजा-पाठ और शिक्षा के प्रति इस लगन को सराहते हैं। परिवारजन बालक के इस अद्वितीय और निष्ठापूर्ण प्रयास को प्रोत्साहित कर रहे हैं।















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