
आसनसोल : कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जिसे भैया दूज के रूप में जाना जाता है, पर कायस्थ समाज द्वारा परंपरागत रूप से भगवान चित्रगुप्त की पूजा अर्चना का आयोजन किया गया। पश्चिम बंगाल में इसी दिन भाई फोटा के नाम से मनाए जाने वाले इस पर्व का विशेष महत्व कायस्थ समाज के बीच है। सीतारामपुर में स्थित कायस्थ समाज के भक्तों ने विधिवत और भक्तिपूर्ण भाव से भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर धर्मपरायणता का परिचय दिया।
पुराणों में वर्णित है कि भगवान चित्रगुप्त का जन्म स्वयं ब्रह्मा जी की काया से हुआ, जिससे वे “कायस्थ” कहलाए। भगवान चित्रगुप्त को समस्त प्राणियों के कर्मों का लेखाजोखा रखने का दायित्व सौंपा गया। मान्यता के अनुसार, उनके हाथ में कर्मों की पुस्तक, लेखनी, दवात और करवाल सुशोभित हैं, जो न्याय और सत्य की रक्षा का प्रतीक हैं। उनके कुशल लेखन से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय प्राप्त होता है। कायस्थ समाज में उनकी पूजा अर्चना का यह पर्व विशेष श्रद्धा के साथ संपन्न होता है, जिसमें जीवन के नैतिक सिद्धांतों और कर्तव्यों की स्मृति का प्रतीक निहित है।

इस अवसर पर सीतारामपुर में कायस्थ समाज द्वारा भव्य पूजा का आयोजन किया गया। समाज के लोगों ने भगवान चित्रगुप्त के सम्मुख श्रद्धा पूर्वक दीप प्रज्वलित कर विधिवत पूजन किया। मंत्रोच्चार, भक्ति गीतों और प्रसाद वितरण के साथ पूजा सम्पन्न हुई।

पूजन समारोह में प्रमुख रूप से समाजसेवी एवं राजनीतिक नेता संतोष कुमार वर्मा और उनका परिवार भी सम्मिलित हुआ। श्री वर्मा ने अपने संबोधन में भगवान चित्रगुप्त के प्रति आस्था प्रकट करते हुए उनके न्यायकारी स्वरूप को समाज के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने समाज के प्रत्येक सदस्य से सत्य, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्मों को शुद्ध और न्यायसंगत बनाए रखने का आह्वान किया।
भगवान चित्रगुप्त की इस आराधना के माध्यम से कायस्थ समाज अपने पूर्वजों की परंपराओं का निर्वहन करते हुए धर्म के प्रति अपनी गहरी आस्था का प्रदर्शन करता है। विशेषकर भैया दूज के दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा के पीछे यह भाव है कि परिवार और समाज में प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा स्वयं ईश्वर के अधीन है, और उनका न्याय ही सर्वोच्च है। कायस्थ समाज के इस भक्तिपूर्ण आयोजन ने सामाजिक और धार्मिक एकता का संदेश प्रसारित किया।















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