
बर्नपुर : शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले विद्यालय यदि स्वयं जर्जर अवस्था में पहुंच जाएं, तो भविष्य की नींव कैसे मजबूत होगी? बर्नपुर के बरथोल फ्री प्राइमरी स्कूल की दयनीय स्थिति इसी कटु सत्य का परिचायक बन चुकी है। 1971 में स्थापित यह विद्यालय अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। कक्षाओं की छत से गिरता प्लास्टर, दीवारों में आई दरारें और उचित मरम्मत के अभाव में छात्रों को असुरक्षित वातावरण में शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
विद्यालय की बदहाल स्थिति से व्यथित अभिभावकों ने शुक्रवार सुबह विद्यालय गेट पर ताला जड़कर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने बच्चों के साथ मिलकर स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। उनका स्पष्ट आरोप था कि कई वर्षों से विद्यालय में मरम्मत कार्य नहीं हुआ, जिसके कारण बच्चों को खुले मैदान में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। अभिभावकों ने कई बार प्रशासन से लिखित अनुरोध किया, परंतु बार-बार की गई शिकायतें अनसुनी रह गईं।

प्रदर्शनकारी अभिभावकों में रीता ओरांग और मधुमिता छेत्री ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि विद्यालय भवन की दुर्दशा इतनी गंभीर हो चुकी है कि कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है। उन्होंने यह भी कहा, “बच्चों को स्कूल भेजने से डर लगता है, यदि अचानक छत का प्लास्टर गिर पड़ा, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?” इसी भय के कारण शिक्षक भी छात्रों को खुले मैदान में पढ़ाने को विवश हैं, किंतु प्रतिकूल मौसम में यह भी संभव नहीं होता।

स्कूल प्रशासन की ओर से सहायक शिक्षक राममोहन मुखोपाध्याय ने प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित करते हुए उनकी मांग को उचित बताया, किंतु विद्यालय गेट पर ताला जड़ने को अनुचित करार दिया। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि मध्याह्न भोजन पकाने के लिए विद्यालय का एक सेक्शन खोला जाए। अभिभावकों ने इस अनुरोध को स्वीकार किया, जिसके बाद छात्रों ने मैदान में बैठकर मध्याह्न भोजन ग्रहण किया।
इस विरोध प्रदर्शन ने पूरे बरथोल गांव में सनसनी फैला दी। यह घटना शिक्षा विभाग की लचर कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। क्या प्रशासन अब भी निद्रा में रहेगा, या फिर बच्चों के भविष्य की सुरक्षा हेतु कोई ठोस कदम उठाएगा?















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