
आसनसोल : शहर की धरोहरों में गिनी जाने वाली ऐतिहासिक अटवाल भवन, जो एक शताब्दी पुरानी वास्तुशिल्पीय कृति थी, अब अतीत के पन्नों में दफन हो चुकी है। इस भवन की जगह आधुनिक बाजार का निर्माण कर दिया गया है, जिसे लेकर शहरवासियों में तीव्र आक्रोश है। सोशल मीडिया पर शिक्षक मोहम्मद कमाल, शिक्षक विश्वनाथ मित्र और इतिहास विशेषज्ञों ने इस धरोहर के विनाश पर शोक व्यक्त किया है।
इतिहासकार दुर्बादल चट्टोपाध्याय के अनुसार, अटवाल भवन का निर्माण मूलतः अर्मेनियाई मेदथ परिवार ने किया था। यह भवन जीटी रोड और हॉटन रोड के संगम पर स्थित था, जो कभी आसनसोल के शहरीकरण का साक्षी था। कोयला खदानों और ईस्ट इंडिया रेलवे के विस्तार के साथ, ब्रिटिश, ईसाई मिशनरी और अन्य यूरोपीय लोग यहां बसने आए। इसी दौरान अर्मेनियाई परिवारों ने आसनसोल में अपनी छाप छोड़ी। इनके नाम पर अपकार गार्डन, एवलिन लॉज और अगाबेग स्कूल जैसे स्थल बने।

1885 में, जब ईस्ट इंडिया रेलवे का क्षेत्रीय आधार रानीगंज से आसनसोल स्थानांतरित हुआ, तो शहर का महत्व बढ़ा और अटवाल भवन का निर्माण हुआ। यह इमारत इंडो-सरसेनिक शैली में निर्मित थी, जिसमें भारतीय और यूरोपीय वास्तुकला का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता था। भवन के निर्माण में बर्न एंड कंपनी द्वारा निर्मित ईंटों का उपयोग किया गया था, जो उस समय खनन और औद्योगिक क्षेत्रों में प्रसिद्ध थी।
20वीं शताब्दी की शुरुआत में, मेदथ परिवार ने भवन की पहली मंजिल पर एक डिपार्टमेंटल स्टोर खोला, जो मुख्यतः ब्रिटिश, यूरोपीय और एंग्लो-इंडियन निवासियों की जरूरतों को पूरा करता था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1916 में इसकी दूसरी मंजिल का निर्माण पूरा हुआ। यह इमारत आसनसोल के मध्य में स्थित थी, जहां से रेलवे स्टेशन और यूरोपीय आवास पास थे।

1947 में, स्वतंत्रता के दौरान, व्यापारी गुरबचन सिंह अटवाल ने इस भवन को मेदथ परिवार से खरीदा और इसका नाम बदलकर “अटवाल ब्रदर्स” कर दिया। उन्होंने इमारत की ऊपरी मंजिल पर होटल व्यवसाय शुरू किया, जो शीघ्र ही धनबाद-आसनसोल-रानीगंज क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित होटल बन गया। इस होटल में बंगाली फिल्म जगत के दिग्गज उत्तम कुमार जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व भी ठहरे थे।
1950 के दशक तक, इस होटल ने कोलकाता और अन्य स्थानों से आने वाले व्यापारियों के लिए ठहरने का प्रमुख केंद्र बनकर ख्याति प्राप्त की। साठ और सत्तर के दशक में यह भवन अपने नीयन रोशनी से सजे नामपट्ट और व्यस्त बाजार के कारण रातभर जीवंत रहता था।
1981 में, इस इमारत का होटल व्यवसाय बंद हो गया, और कुछ समय के लिए यहां अटवाल परिवार का कार्यालय संचालित हुआ। इसके बाद भवन में स्टेट बैंक की शाखा भी खोली गई। अंतिम समय तक, भूतल पर स्थित कपड़ा बाजार और शराब की दुकान ही सक्रिय थे, जो 2018 में बंद हो गए।
आज, यह सदियों पुरानी इमारत, जो कभी आसनसोल की विरासत और अर्मेनियाई स्थापत्य कला का प्रतीक थी, जमींदोज हो चुकी है। आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक धरोहर को केवल किस्सों और दस्तावेजों में ही जान पाएंगी। शहरवासियों के लिए यह न केवल एक भवन का विनाश है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत का अपूरणीय नुकसान भी है।















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