

रानीगंज : दीपावली के पावन पर्व के आगमन के साथ ही रोशनी की विविधता ने बाजारों को रंगीन कर दिया है। इलेक्ट्रॉनिक लाइटों का प्रचलन, परंपरागत मिट्टी के दीयों को धीरे-धीरे अप्रचलित कर रहा है। इस परिदृश्य में, रानीगंज के हटिया तालाब के कुम्हार पाड़ा के कुम्हारों की स्थिति विषम हो गई है, जो अब मिट्टी के दीये बहुत कम मात्रा में बना रहे हैं। वर्तमान परिदृश्य में, कुम्हार समुदाय केवल रीति-रिवाजों की पूर्ति हेतु कुछेक दीयों का निर्माण कर रहा है।

कुम्हार पाड़ा में 55 वर्षीय बबलू पंडित ने बताया कि 100 पीस मिट्टी के दीये की कीमत मात्र 60 से 70 रुपये तक सिमट गई है, जिससे कुम्हारों की आर्थिक स्थिति जर्जर हो रही है। उन्होंने बताया कि मिट्टी के कुल्हड़ों की मांग कई गुना बढ़ने के कारण, वे अधिकतर समय कुल्हड़ बनाने में ही व्यस्त हैं। कुम्हारों का मानना है कि मिट्टी के दीयों की बिक्री में गिरावट और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के प्रचलन ने उनकी रोजी-रोटी पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

इस बीच, बाजार में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और पानी से संचालित होने वाले वॉटर लैंप की मांग तेजी से बढ़ रही है। दीपावली के समय बाजार में लोग डिजिटल लाइट्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जो अपेक्षाकृत सस्ती और बहुरंगी होती हैं। विभिन्न प्रकार की डिजिटल लाइट्स 25 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की कीमतों पर उपलब्ध हैं, जो लोगों को सस्ते दाम पर प्रकाश सज्जा की सुविधा प्रदान कर रही हैं।
कुम्हार पाड़ा में कुम्हार, सरकार से किसी भी प्रकार की सहायता न मिलने के कारण, अपने बूते पर सीमित मात्रा में दीयों का निर्माण कर रहे हैं और उन्हें थोक विक्रेताओं को बेच रहे हैं। दीयों के निर्माण की न्यूनतम संख्या के कारण उनकी कीमतें भी काफी बढ़ गई हैं, जिससे सामान्य जनता का रुझान इलेक्ट्रॉनिक विकल्पों की ओर बढ़ता जा रहा है।
मिट्टी के दीयों की बढ़ती कीमतों ने बाजार में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और वॉटर लैंप्स की बिक्री में उछाल ला दिया है। वॉटर लैंप, जो कि पानी की कुछ बूंदें डालने पर जल उठते हैं, ग्राहकों को बहुत आकर्षित कर रहे हैं। वर्तमान समय में, हर कोई अपने घरों की साज-सज्जा के लिए डिजिटल लाइट्स पर निर्भर होता जा रहा है, क्योंकि वे सस्ते और आकर्षक होते हैं।
रानीगंज के पूजा बाजार में मिट्टी के दीये अब दुर्लभ हो चले हैं। कुम्हारों के लिए, कुल्हड़ बनाना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है, जिसके चलते वे दीयों का निर्माण न के बराबर कर रहे हैं। दूसरी ओर, बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों की उपलब्धता और उनकी आकर्षक कीमतें, लोगों को परंपरागत मिट्टी के दीयों से दूर ले जा रही हैं।
इस प्रकार, रानीगंज के कुम्हारों के समक्ष आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही हैं और परंपरागत दीपावली की प्राचीनता धीरे-धीरे लुप्तप्राय होती प्रतीत हो रही है।















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