श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कल, गृहस्थों के लिए निशीथ पूजन, वैष्णवों के लिए चार सितंबर को उत्सव

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आसनसोल :   भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व जन्माष्टमी इस वर्ष शुक्रवार, 4 सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। पर्व को लेकर मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और घरों में तैयारियां अंतिम v:v::a’:में पहुंच गई हैं। सनातन परंपरा में जन्माष्टमी का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा-अर्चना करते हैं तथा व्रत, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भगवान के जन्मोत्सव को मनाते हैं।

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ज्योतिषविद पंडित हेमंत मिश्रा (MAJY) के अनुसार, पंचांग की गणना और परंपरागत मान्यताओं के आधार पर इस वर्ष 4 सितंबर को जन्माष्टमी का मुख्य पर्व मनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि गृहस्थों और वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले साधु-संतों के लिए व्रत एवं पूजन की विधि में कुछ अंतर हो सकता है, हालांकि इस वर्ष दोनों परंपराओं में जन्माष्टमी उत्सव की मुख्य तिथि 4 सितंबर ही रहेगी।

गृहस्थों के लिए मध्यरात्रि में जन्मोत्सव

पंडित मिश्रा ने बताया कि गृहस्थ परिवारों में जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा की जाती है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और रात में निशीथ काल के दौरान भगवान के जन्मोत्सव का आयोजन करते हैं।

मध्यरात्रि में मंदिरों और घरों में शंख, घंटी और घड़ियाल की ध्वनि के बीच श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसके बाद बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर नए वस्त्र और आभूषण धारण कराए जाते हैं। भगवान को माखन-मिश्री, फल, मिठाई तथा अन्य नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु आरती और भजन-कीर्तन के बाद अपनी परंपरा तथा पंचांग में निर्धारित नियमों के अनुसार व्रत का समापन करते हैं।

वैष्णव परंपरा में भी विशेष आयोजन

उन्होंने बताया कि वैष्णव संप्रदाय, मठों और धार्मिक परंपराओं से जुड़े साधु-संत जन्माष्टमी का पालन अपने संप्रदायगत पंचांग और निर्धारित धार्मिक विधियों के अनुसार करते हैं। इनके लिए सूर्योदय के समय तिथि की स्थिति, सप्तमी-अष्टमी का संयोग तथा अन्य पंचांगीय गणनाएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

वैष्णव साधना में व्रत के साथ भगवान श्रीकृष्ण के नाम-स्मरण, जप, ध्यान, भजन और कीर्तन को विशेष महत्व दिया जाता है। कई वैष्णव परंपराओं में भगवान के जन्मोत्सव के अगले दिन नंदोत्सव का आयोजन भी किया जाता है। इस दौरान भगवान नंद के घर जन्मे बालकृष्ण के आगमन की खुशी में भक्तगण उत्सव मनाते हैं।

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मंदिरों में तैयारियां तेज

जन्माष्टमी को लेकर आसनसोल और आसपास के क्षेत्रों के विभिन्न मंदिरों में विशेष सजावट की जा रही है। भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के विग्रहों को आकर्षक ढंग से सजाने के साथ झांकी और धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारी की जा रही है। कई स्थानों पर रात में भजन-कीर्तन और आरती के विशेष आयोजन होंगे।

पंडित हेमंत मिश्रा ने श्रद्धालुओं से पर्व को आस्था, संयम और सात्विक भावना के साथ मनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनके द्वारा दिए गए धर्म, कर्म तथा सत्य के संदेश को स्मरण करने का अवसर भी है।

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