
आसनसोल : पश्चिम बंगाल के बराकर क्षेत्र में दामोदर नदी के निकट स्थित ऐतिहासिक सीधेश्वरी मंदिर, अपनी प्राचीनता और विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए ख्यात, वर्तमान में अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। करीब ढाई हजार वर्ष पुराना माना जाने वाला यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक महत्ता और आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है, किंतु भारतीय पुरातत्व विभाग के हस्तक्षेप और समय-समय पर उपेक्षा के चलते इसका मूल स्वरूप धूमिल होता जा रहा है।
मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
सीधेश्वरी मंदिर के पुरोहितों का दावा है कि यह मंदिर लगभग ढाई हजार वर्ष पुराना है। हरेकृष्ण बाबा, जो अपने गुरु स्वर्गीय सीताराम बाबा के शिष्य हैं, ने बताया कि सीताराम बाबा ने इस मंदिर में 1923-24 के बीच सिद्धि प्राप्त की थी। इसके उपरांत उन्होंने मंदिर के समीप गौरंगों मंदिर का निर्माण कराया।
भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार, यह मंदिर शष्ठम शताब्दी का है, जो इसे लगभग 1400 वर्ष पुराना सिद्ध करता है। इस मंदिर परिसर में कुल चार मंदिर स्थित हैं, जो उड़ीसा शैली के जगन्नाथ मंदिर और उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से प्रभावित हैं। इनमें सीधेश्वरी देवी, पार्वती, गणेश और माँ भगवती के मंदिर शामिल हैं।

एक पत्थर पर निर्मित मंदिर
सीधेश्वरी मंदिर तीन एकड़ भूमि पर स्थित है और इसकी विशेषता यह है कि यह एक ही विशाल शिला पर निर्मित है। इस क्षेत्र में कोयला खदानें होने के बावजूद मंदिर के स्थान पर कोयले का कोई भंडार नहीं पाया गया। यह मंदिर क्षेत्र एकल पत्थर से निर्मित है, जो गहराई तक फैला हुआ है।
मंदिर की ऐतिहासिक उपेक्षा और वर्तमान स्थिति
मंदिर के एक दीवार पर पाली भाषा में अंकित शिलालेख इसके प्राचीन इतिहास का प्रमाण है। किंतु श्रद्धालुओं द्वारा दीवार पर नारियल फोड़ने और पूजा सामग्री पोंछने की आदत के कारण यह शिलालेख धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहा है। हरेकृष्ण बाबा ने बताया कि यह मंदिर राजा हरिश्चंद्र और उनकी पत्नी हरीप्रिया के संरक्षण में निर्मित हुआ था। कालांतर में यह मंदिर राजा इच्छाई घोष और अन्य राजाओं के अधीन रहा। समय के साथ मंदिर का रखरखाव उपेक्षित होता गया, जिससे इसकी स्थिति खराब होती रही।
पुरातत्व विभाग पर छेड़छाड़ का आरोप
गौरंगों मंदिर के पुजारी हरेकृष्ण बाबा ने भारतीय पुरातत्व विभाग पर आरोप लगाया है कि उसने सीधेश्वरी मंदिर के चारों मंदिरों को अलग-अलग देवी-देवताओं के नाम से नामांकित कर इसका मूल इतिहास बदलने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव के अतिरिक्त किसी अन्य देवता के मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा नहीं होती, जो इस बात का संकेत है कि यह मंदिर प्राचीन शिवलिंगों का केंद्र है।
पुजारी ने दावा किया कि मंदिर में कुल 12 शिवलिंग स्थापित हैं, जो इसे एक प्रकार से 12 ज्योतिर्लिंगों का स्वरूप प्रदान करते हैं। उन्होंने पुरातत्व विभाग से आग्रह किया कि मंदिर के ऐतिहासिक सत्य को उजागर किया जाए और इसे धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।

स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं की अपील
मंदिर के पुजारी और श्रद्धालु पुरातत्व विभाग से अनुरोध कर रहे हैं कि सीधेश्वरी मंदिर के प्राचीन महत्व को पुनर्स्थापित किया जाए। वे चाहते हैं कि इस मंदिर को देश के अन्य प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों—सोमनाथ, महाकालेश्वर, वैद्यनाथ आदि—की भाँति मान्यता दी जाए।
उपेक्षा से विलुप्त होती विरासत
मंदिर के पुजारी और स्थानीय निवासी इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए सरकार और पुरातत्व विभाग से ठोस कदम उठाने की माँग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि मंदिर के वास्तविक इतिहास और धार्मिक महत्व को उजागर कर इसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्रदान की जाए। समय रहते उचित संरक्षण के अभाव में यह मंदिर अपना ऐतिहासिक अस्तित्व पूरी तरह खो सकता है।















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